रिलीज़ के लगभग दस साल बाद, पोकेमोन गो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को एक अप्रत्याशित तरीके से प्रभावित कर रहा है।
MIT Technology Review की एक रिपोर्ट(नई विंडो) के मुताबिक, गेम के मूल डेवलपर से निकली AI कंपनी Niantic Spatial, पोकेमोन गो के खिलाड़ियों द्वारा कैप्चर किए गए शहरी लैंडमार्क्स की 30 अरब से ज़्यादा इमेज(नई विंडो) का इस्तेमाल ऐसे AI सिस्टम को ट्रेन करने के लिए कर रही है जो रोबोट्स को ये समझने में मदद करते हैं कि वे असली दुनिया में कहां हैं।
जब पोकेमोन गो 2016 में लॉन्च हुआ, तो लाखों खिलाड़ी डिजिटल जीवों की खोज करते हुए अपने शहरों में घूमे और इमारतों, पार्कों, लैंडमार्क्स की तरफ फोन पॉइंट किए। ऐसा करते हुए उन्होंने अब तक इकट्ठा की गई असली दुनिया की इमेजरी के सबसे बड़े डेटासेट में से एक बनाया। Niantic Spatial ने अपने मॉडल को शहरी माहौल में कैप्चर किए गए 30 अरब इमेज पे ट्रेन किया, जिनमें से कई ऐसे स्थानों के आसपास क्लस्टर्ड थे जहां खिलाड़ी गेम में बार-बार जाते थे। कभी-कभी डिजिटल जीव अपार्टमेंट बिल्डिंग या रेसिडेंशियल कोर्टयार्ड जैसी निजी जगहों में या उनके पास दिखाई देते थे, यानी वो पल AI डेटासेट का हिस्सा बन गए होंगे।
वो डेटा अब एक “वर्ल्ड मॉडल” बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है, यानी एक ऐसा AI सिस्टम जो मशीनों को फिजिकल माहौल को समझने और नेविगेट करने में मदद के लिए डिज़ाइन किया गया है।
ये आधुनिक टेक्नोलॉजी के बारे में एक ऐसी बात भी हाइलाइट करता है जिसे नज़रअंदाज़ करना आसान है: रोज़मर्रा की ऐप एक्टिविटी सालों बाद चुपचाप AI सिस्टम के लिए कीमती ट्रेनिंग डेटा बन सकती है, जिसकी पोकेमोन गो के खिलाड़ी 2016 में कल्पना भी नहीं कर सकते थे, सार्थक सहमति तो बहुत दूर की बात थी।
शहरों में GPS को दिक्कत क्यों होती है
घने शहरी माहौल में GPS सिग्नल अक्सर ऊंची इमारतों से टकराकर लौटते हैं, काफी भटकते हैं, या पूरी तरह गायब हो जाते हैं, जिसे कभी-कभी “अर्बन कैनियन” इफेक्ट कहा जाता है। जैसा कि MIT Technology Review इस टेक्नोलॉजी पे अपनी रिपोर्ट में समझाता है, स्मार्टफोन के स्थान संकेतक भी शहरों में दर्जनों मीटर तक भटक सकते हैं, जिससे अक्सर डिवाइस गलत ब्लॉक पे या सड़क की गलत तरफ दिखता है।
Niantic Spatial का समाधान एक विज़ुअल पोज़िशनिंग सिस्टम(नई विंडो) पे निर्भर है, जो कैमरा जो देखता है उसका विश्लेषण करके स्थान तय करता है। आसपास की इमारतों और लैंडमार्क्स के स्नैपशॉट को अपने विशाल डेटासेट से मिलाकर, ये सिस्टम कथित तौर पर कुछ सेंटीमीटर की सटीकता के साथ स्थान की पहचान कर सकता है।
ऑगमेंटेड रियलिटी से डिलीवरी रोबोट्स तक
Niantic Spatial की टेक्नोलॉजी के असली दुनिया के पहले टेस्ट में से एक Coco Robotics के साथ पार्टनरशिप के ज़रिए हो रहा है, जो कई शहरों में फुटपाथ पे डिलीवरी रोबोट्स चलाने वाला एक स्टार्टअप है।
कंपनी के रोबोट्स लॉस एंजिलिस, शिकागो, मियामी और हेलसिंकी जैसी जगहों पे किराने का सामान और रेस्टोरेंट ऑर्डर पहुंचाते हैं। MIT Technology Review की रिपोर्ट के मुताबिक, Coco के रोबोट्स अब तक पांच लाख से ज़्यादा डिलीवरी पूरी कर चुके हैं और लाखों मील का सफर तय कर चुके हैं।
घनी आबादी वाले शहरों में भरोसेमंद तरीके से नेविगेट करना ऑटोनॉमस मशीनों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। रोबोट्स के कैमरों को Niantic Spatial के विज़ुअल पोज़िशनिंग सिस्टम के साथ मिलाकर, ये मशीनें बेहतर तरीके से तय कर सकती हैं कि वे ठीक कहां हैं, जिससे वे पिकअप स्थानों पे या ग्राहक के दरवाज़े के बाहर सटीक रुक सकती हैं।
“वर्ल्ड मॉडल्स” का उभार
ये प्रोजेक्ट AI डेवलपमेंट के एक बड़े रुझान को दर्शाता है।
लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स को इंटरनेट की इमेज और टेक्स्ट पे ट्रेन किया जाता है। इसके उलट, वर्ल्ड मॉडल्स का मकसद मशीनों को ये समझने में मदद करना है कि फिजिकल दुनिया खुद कैसे संरचित है — चीजें कहां हैं, स्पेस आपस में कैसे कनेक्ट होते हैं, और उनमें से सुरक्षित तरीके से कैसे गुज़रा जाए।
Niantic Spatial कहता है कि इसका लंबे समय का मकसद दुनिया का एक लगातार अपडेट हुआ “लिविंग मैप” बनाना है, जिसका इस्तेमाल रोबोट्स और दूसरे AI सिस्टम नेविगेट करने के लिए कर सकते हैं।
इसका निजता के लिए क्या मतलब है
ये कहानी ये भी दिखाती है कि आम लोगों द्वारा रोज़मर्रा के ऐप्स के इस्तेमाल से बनाए गए डेटा का दोबारा इस्तेमाल होने में एक बड़ा बदलाव आ रहा है।
लाखों लोगों ने एक गेम खेलने के लिए Pokémon Go डाउनलोड किया। लेकिन इस दौरान उन्होंने अरबों इमेज और असली दुनिया की जगहों से जुड़े सटीक स्थान सिग्नल भी जनरेट किए। ये डेटा अब ऐसे AI सिस्टम को ट्रेन करने में मदद कर रहा है जो फिजिकल दुनिया को मैप और नेविगेट करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। ये पिकाचू की खोज में गेम शुरू करने वाले खिलाड़ी के मकसद से बहुत दूर की बात है
ये AI इकोनॉमी में एक जाना-पहचाना पैटर्न बनता जा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से असंबंधित लगने वाली गतिविधियां — फोटो लेना, वेब ब्राउज़ करना, ऐप्स इस्तेमाल करना — अक्सर ऐसे डेटासेट तैयार कर देती हैं जिनका इस्तेमाल दमदार नए सिस्टम को ट्रेन करने के लिए होता है। आधुनिक AI मॉडल्स अक्सर इंटरनेट और दूसरे डिजिटल सोर्सेज से स्क्रैप किए गए डेटा के बड़े संग्रह का इस्तेमाल करके बनाए जाते हैं, जिनमें शोधकर्ताओं के मुताबिक कभी-कभी पर्सनल जानकारी या सेंसिटिव डेटा भी शामिल हो सकता है।
जैसे-जैसे कंपनियां वर्ल्ड मॉडल्स और AI के दूसरे रूप बनाने की दौड़ में लगी हैं, सवाल ये बन जाता है कि आखिर ट्रेनिंग डेटा कहां से आता है — और क्या उसे जनरेट करने वाले लोगों ने कभी सोचा था कि वो डेटा कैसे इस्तेमाल होगा, या नतीजों के बारे में जानने के बाद भी वे उन ऐप्स को इस्तेमाल करने पे सहमत होते। नीति-निर्माताओं और शोधकर्ताओं ने AI ट्रेनिंग में इस्तेमाल होने वाले डेटा के लिए ज़्यादा साफ सहमति के मानकों(नई विंडो) की मांग बढ़ाई है, यह कहते हुए कि क्रिएटर्स और उपयोगकर्ताओं को इस बात पे ज़्यादा कंट्रोल होना चाहिए कि उनका डेटा कैसे दोबारा इस्तेमाल होता है।
ये AI निजता की चिंताएं पहले ही अदालत में अपना रूप ले चुकी हैं। पब्लिशर्स, लेखकों और मीडिया कंपनियों ने मुकदमे दायर किए हैं, जिनमें दावा किया गया है कि उनके काम का इस्तेमाल बिना अनुमति AI सिस्टम को ट्रेन करने के लिए किया गया, जिनमें एक बड़ा केस वो भी है जिसमें The New York Times ने OpenAI और Microsoft पर मुकदमा दायर किया(नई विंडो) है, यह आरोप लगाते हुए कि उसकी पत्रकारिता का इस्तेमाल AI ट्रेनिंग डेटासेट में किया गया।
फिजिकल दुनिया में नेविगेट करने वाली AI बनाने वाली कंपनियों के लिए, गेम्स, ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म के ज़रिए बनाए गए डेटासेट टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री की सबसे कीमती एसेट्स में से एक बनते जा रहे हैं। ऐसे में पारदर्शिता, सहमति और यूज़र-जनरेटेड डेटा के दोबारा इस्तेमाल को लेकर सवाल नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होते जा रहे हैं।
हर कोई इस डेटा के भूखे मॉडल का पीछा नहीं कर रहा। Proton में हम निजी और पारदर्शी AI में यकीन रखते हैं, जो आपको निजता की कीमत चुकाए बिना एक AI असिस्टेंट(नई विंडो) के फायदे देता है। Lumo आपका डेटा कभी लॉग नहीं करता, आपकी सेंसिटिव बातचीत पे ट्रेन नहीं होता, या आपकी जानकारी किसी के साथ शेयर नहीं करता। इसका मतलब है ये सोचे बिना AI का इस्तेमाल करना कि आज की बातचीत चुपचाप कल का डेटासेट न बन जाए।






