बच्चों के लिए ऑनलाइन खतरे असली हैं, लेकिन दुनिया भर में हम जिस उम्र सत्यापन के जल्दबाजी भरे पीछा को देख रहे हैं, वो अपने तरीके में अस्वीकार्य और दायरे में काफी ज्यादा बड़ा है, और हम इसमें गड़बड़ करने का जोखिम बिल्कुल नहीं ले सकते।

साफ तौर पे कहें तो, माता-पिता की चिंताएं सही और ईमानदार हैं। बहुत कम लोग ये तर्क देंगे कि बच्चों को वयस्क सामग्री, खुद को नुकसान पहुंचाने के तरीकों और ऐसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म की बिना रोक-टोक एक्सेस मिलनी चाहिए जो उन्हें मैनिपुलेट करते हैं और दुर्व्यवहार के संपर्क में लाते हैं।

लेकिन इन्हीं चिंताओं की गहराई का बेशर्मी से फायदा उठाया जा रहा है। उम्र सत्यापन जैसा कि एक के बाद एक देश में अभी पेश किया जा रहा है, वो ऑनलाइन गुमनामी का अंत होगा।

और हमें पूरी तरह पता है कि फायदा किसे होगा: वही टेक दिग्गज जिन्होंने वो निजता का दुःस्वप्न बनाया है जो आज इंटरनेट है।

जब डाटा इकट्ठा किया जाता है, तो वो बाहर निकल आता है

“इस बॉक्स पे टिक करें अगर आपकी उम्र 18 से ज्यादा है” वाले दिनों के बाद इंटरनेट पर उम्र की जांच के धंधे ने बहुत आगे का सफर तय कर लिया है। अब लोग पासपोर्ट, वीडियो और यहां तक कि फिंगरप्रिंट भी भेज रहे हैं। और क्या हुआ? वही जो हमेशा होता आया है: वो डाटा लीक हो जाता है।

Discord को देखें। पिछले अक्टूबर में गेमर्स के पसंदीदा चैट प्लैटफॉर्म ने माना था कि हैकर्स ने 70,000 से ज़्यादा उपयोगकर्ताओं के रिकॉर्ड एक्सेस कर लिए थे, जिनमें सरकारी आईडी की तस्वीरें भी शामिल थीं और जो उम्र सत्यापन लागू करने के लिए रखे गए तीसरें-पार्टी वेंडर के पास रखे गए थे।

और ये होता रहेगा। जितना ज्यादा संवेदनशील डाटा आप निजी डेटाबेस में जमा करेंगे, वो अपराधियों के लिए उतना ही बड़ा निशाना बन जाएगा। अगर किसी सोशल प्लैटफॉर्म या डेटिंग ऐप, जिसके पास कोई खास अनुभव नहीं है, को डाटा इकट्ठा करने का हुक्म दिया जाए, तो वो आसान शिकार बन जाते हैं। हजारों कंपनियां शायद ये सही तरीके से संभाल लें, लेकिन उनमें से कुछ असफल होंगी ही। (Ashley Madison(नई विंडो) याद है?)

अगर आप उम्र सत्यापन को किसी “स्पेशलिस्ट” तीसरें-पार्टी को सौंप भी दें, तो जैसा Discord ने पाया, वो कोई जादू की छड़ी नहीं है। जब उम्र की जांच ही किसी कंपनी का एकमात्र धंधा हो, तो कंपनी डाटा को हैकर्स से बचाने में ज्यादा महारत हासिल कर सकती है, लेकिन वो निशाना भी और भी आकर्षक बन जाता है। और चूंकि उसके पास आय के दूसरे स्रोत नहीं होते, उसे अपनी लागत की भरपाई किसी तरह करनी ही होती है — और उस डाटा से कमाई करने, उसे बेचने का लालच मना करना मुश्किल हो जाता है।

यहां कोई हीरो नहीं है

मदद की उम्मीद सरकारों से नहीं की जा सकती। यूरोपीय संघ ने अभी-अभी लोगों की उम्र जांचने के लिए एक मोबाइल ऐप पेश किया, और हैकर्स को उसमें जानलेवा कमियां ढूंढने में कुछ ही घंटे लगे — एक ने तो सिर्फ दो मिनट का दावा किया

बिग टेक के हस्तक्षेप की मांग भी बढ़ रही है। लोग कहते हैं, Apple, Google और Microsoft से ये करवाओ। ऑपरेटिंग सिस्टम पर उनके कब्जे की वजह से, वो आईडी मांग सकते हैं और डिवाइस लेवल पे बच्चों का एक्सेस ब्लॉक कर सकते हैं, ना? और ठीक कुछ हफ्ते पहले ही, Apple ने UK में ठीक यही करने का एक प्लैन ऐलान किया

लेकिन इन कंपनियों ने डाटा इकट्ठा करने और प्रतिस्पर्धियों को नुकसान पहुंचाने के लिए अपने प्रोडक्ट्स को प्राथमिकता देने के भरोसे पे अपनी सल्तनत खड़ी की है। ऐसा करने पे उन्होंने अरबों के जुर्माने चुकाए हैं। अगर उन्हें ये तय करने की और ज़्यादा ताकत मिल जाए कि कौन क्या डाउनलोड करें, और ये ट्रैक करने की कि कौन क्या कर रहा है, तो क्या कोई सच में ये मानता है कि वो उस ताकत का दुरुपयोग नहीं करेंगे?

वयस्कों के लिए आईडी सत्यापन की ओर ले जाता है

ऑनलाइन निजता हमेशा से नाजुक रही है। लेकिन उम्र सत्यापन के साथ हम दहलीज पे हैं, जहां एक बार और हमेशा के लिए हर उस इंसान से आईडी मांगी जाएगी जो किसी भी वजह से, कानूनी हो या नहीं, वयस्क हो या नहीं, ऑनलाइन आता है। और ये हम सबके लिए डरावना होना चाहिए।

हालांकि कोई भी कंपनी अपने अधिकार क्षेत्र के कानूनों की अनदेखी नहीं कर सकती, बिग टेक कंपनियों ने दिखा दिया है कि वो सरकारों के साथ बड़े पैमाने पे मिलीभगत करेंगी। वो हर साल सरकारों की लाखों डाटा रिक्वेस्ट के साथ सहयोग करती हैं, जिनमें से कई को जज ने कभी देखा तक नहीं, और ये संख्या सिर्फ बढ़ रही है।

इसके अलावा, वो सरकारी दबाव के आगे झुककर ऐप बैन करती हैं(नई विंडो), ये तो सबको पता है। अगर UK में हर Apple खाता सरकारी आईडी से जुड़ा होगा, तो हर दूसरे देश को यही उम्मीद करने में कितना वक्त लगेगा? एक बार इन इकट्ठा की गई आईडी का इस्तेमाल उम्र के आधार पे एक्सेस ब्लॉक करने के लिए होने लगा, तो राष्ट्रीयता या अन्य कारकों के आधार पे एक्सेस ब्लॉक करने का रास्ता बहुत छोटा है।

कितने वक्त बाद China हर उस इंसान का नाम मांगेगा जिसने किसी ऐप को डाउनलोड किया हो? कितने वक्त बाद “अनचाहे” लोगों की सूचियां टेक दिग्गजों को भेजी जाएंगी, पूरी तरह इंटरनेट से ब्लॉक करने के हुक्म के साथ? क्या हम सच में इस रास्ते पे चलने को तैयार हैं?

जब ऑनलाइन गुमनामी छिन जाती है, तो भ्रष्टाचार उजागर करने वाले चुप रह जाते हैं। जिन लोगों को मदद की सख्त जरूरत होती है, वो मांगते भी नहीं। और लोकतंत्र खुद पीड़ित होता है, क्योंकि जो अपनी सरकार को जवाबदेह ठहराना चाहते हैं, वो हमेशा अपना असली नाम जोड़कर ऐसा करना नहीं चाहते।

ताकत का हस्तांतरण जरूरी है, लेकिन बिग टेक को नहीं

टेक्नोलॉजी कंपनियों को इंटरनेट पर हर वयस्क का गेटकीपर बनना कभी नहीं चाहिए, लेकिन उन्हें फिर भी अपना योगदान देना होगा। उन्हें अपनी डिजाइन की पूरी ताकत ऐप और डिवाइस, दोनों लेवल पे पैरेंटल-कंट्रोल की खासियतों को बेहतर बनाने की ओर लगानी चाहिए। ये साफ दिखने वाली और इस्तेमाल में आसान होनी चाहिए, ना कि छुपे मेन्यू में बिखरी हुई बाद की सोच। इससे बच्चों की सुरक्षा की ताकत और अधिकार वहीं मजबूती से रहेगा जहां वो होना चाहिए: माता-पिता के पास।

हम ऐसी दुनिया स्वीकार नहीं कर सकते जहां हर वयस्क से ऑनलाइन आने की कीमत के तौर पे आईडी सौंपने की उम्मीद की जाए। उम्र सत्यापन की जरूरत वाली जगहों का दायरा सख्ती से सिर्फ पोर्नोग्राफी और सोशल मीडिया जैसे क्षेत्रों तक सीमित होना चाहिए, जहां नुकसान की संभावना सबसे ज्यादा है।

और अगर हम समाज के तौर पे ये निष्कर्ष निकालें कि सीमित दायरे वाला उम्र-सत्यापन सिस्टम जरूरी भी है और अपरिहार्य भी, तो उसे सही तरीके से किया जाना चाहिए। जांच पूरी तरह क्लाइंट-साइड पे, उपयोगकर्ता के डिवाइस पे होनी चाहिए। वो अपलोड की गई आईडी नहीं, बल्कि चेहरे के स्कैन पे आधारित होनी चाहिए, जो प्रोसेस होते ही फेंक दिए जाएं। उपयोगकर्ता “उम्र का” है या नहीं, इस सीधे सवाल का जवाब पूरी तरह गुमनाम होना चाहिए, किसी भी पहचान वाली जानकारी से अलग, और पूरी तरह शुरु-से-अंत तक एन्क्रिप्शन के तहत भेजा जाना चाहिए। और इस सिस्टम के आधार में जो कोड है, वो ओपन-सोर्स होना चाहिए, ताकि जनता को पक्का पता हो सके कि ये उम्मीदें पूरी हो रही हैं।

असली खतरे क्या हैं, ये कभी ना भूलें

ये शर्तें गैर-परक्राम्य हैं, क्योंकि ये पक्का करने का एकमात्र तरीका कि उम्र-सत्यापन का डाटा चोरी, शेयर या दुरुपयोग नहीं होगा, ये है कि उसे बिल्कुल इकट्ठा ही ना किया जाए। हम उसे उन्हीं दिग्गजों को निश्चित रूप से नहीं सौंप सकते जिनके पास हमारी निजी जानकारी का शोषण करने का साबित इतिहास है। ना उन चेहरा-रहित नई कंपनियों को जिन्हें गलत काम करने के प्रोत्साहन मिलते हैं। ना उन सरकारों को जिनका, सच कहें तो, उपयोगकर्ता जानकारी की सुरक्षा में नाकाम रहने(नई विंडो) या खुद उसका दुरुपयोग करने(नई विंडो) का अपना इतिहास है।

और थोड़ा-थोड़ा करके, हमें ऑनलाइन देखे जाने वाले इतने नुकसान की असली जड़ से निपटना होगा: वो विज्ञापन- और ध्यान-आधारित बिजनेस मॉडल जो लगभग हर कंपनी को जासूसी, ट्रैकिंग, और सबको, खासकर बच्चों को, अपने प्रोडक्ट्स के आदी बनाए रखने(नई विंडो) का प्रोत्साहन देता है।

Meta, Facebook की पैरेंट कंपनी, सालों से उम्र सत्यापन के पक्ष में जोरदार लॉबिंग(नई विंडो) कर रही है, लेकिन बच्चों की चिंता से नहीं। वो अपने कंधों से हर जिम्मेदारी उतारना चाहते हैं, ताकि वो अपने जहरीले प्रोडक्ट्स से वयस्कों को निशाना बनाते रह सकें। उम्र सत्यापन को हमें बच्चों और वयस्कों, दोनों के लिए असली खतरे से ध्यान नहीं हटाना चाहिए।

वहां मौजूद सारे ऑनलाइन खतरों को देखते हुए, बच्चों की सुरक्षा के लिए “कुछ करने” की इच्छा समझ में आती है, यहां तक कि सराहनीय भी। लेकिन उम्र सत्यापन के साथ, हम इंटरनेट के सबसे बुरे पहलुओं को स्थायी बनाने और मजबूत करने के खतरे में हैं। और इन सारी अच्छी नीयतों के रास्ते का अंत सचमुच एक नर्क जैसी जगह है।